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जीवन के सफर में माता वैष्णो देवी | mata vaishno devi के दर्शन हेतु मेरी प्रथम यात्रा

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अपनी Biography की आज की पोस्ट में मैं जीवन के सफर | journey of life में माता वैष्णो देवी की प्रथम यात्रा के बाबत सच्ची व वास्तविक जानकारी दूंगा, और यात्रा संबंधित कुछ महत्वपूर्ण अनुभव आप सभी के साथ सांझा करूंगा। मेरे यह जिंदगी के अनुभव माँ वैष्णो देवी के दर्शन के लिये जाने वाले माँ के  भक्तों के लिये उपयोगी साबित हो सकते हैं। मां भगवती की असीम कृपा से मुझे भी कई बार माता वैष्णो देवी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। दोस्तों ,             जैसे कि मैं Funda of life में पूर्व में ही अपनी विभिन्न पोस्टों में अपने बारे में काफी विस्तार से बता चुका हूं कि किस तरह मुझे छोटी उम्र में ही घर से काफी दूर जाकर अकेले ही दुकान करनी पड़ी और जिंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव और झंझावात को झेलते हुए मेरी जिंदगी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। हमने बचपन से ही अपने घर परिवार में तथा रिश्तेदारों से माता वैष्णो देवी के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था, तथा मन में दबी हुई यह एक इच्छा थी की जीवन में एक बार मुझे जम्मू कश्मीर में स्थित माता वैष्णो देवी के दरबार में माथा ...

जब स्कूल टाइम में पिक्चर हॉल में छात्रों तथा टीचर्स का आमना सामना हुआ।

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जीवन के सफर | journey of life   में इंसान को कदम - कदम पर जिंदगी के नए-नए रूप देखने को मिल जाते हैं। कुछ घटनाएं जाने-अनजाने में ऐसे घटित हो जाती हैं, जोकि इंसान के मन मस्तिष्क पर बहुत ही गहराई तक अंकित हो जाती है। अपनी biography में आज मैं आपको एक ऐसी ही सच्ची घटना के बाबत विस्तार से बताऊंगा।  मेरे साथ भी जीवन में एक बार ऐसी घटना घटित हुई जिसको याद कर आज भी होठों पर बरबस ही हंसी आ जाती है तथा अपने किशोरावस्था तथा विद्यार्थी जीवन का रंगीन जमाना याद आ जाता है।  कितने सुंदर दिन थे , हम लोग कल्पना लोक में जीते थे तथा दिन में ही रंगीन सपने अक्सर देखा करते थेे। वह उम्र ऐसी थी जब बच्चे में परिपक्वता ना के बराबर होती है, जहां पर 4 बच्चों ने मिलकर किसी काम के लिए हामी भर दी, तो सभी बच्चेे उस कार्य को करने के लिए उतावले हो जाते हैं । उनमें ज्यादा सोचने की शक्ति नहीं होती, ना ही वह किसी की बात सुनना चाहते हैं।  ऐसेे ही एक घटना मेरे साथ घटी, जिसको याद करके अब भी होठों पर हंसी आ जाती है। काश वह दिन फिर से वापिस आ पाते। (कोई लौटा दे मेरे वो गुजरे हुए दिन)  जब पिक्चर हॉल म...

प्रेमपत्र पहुंचाने के लिए मुझे फेरीवाला का रूप धरकर 150 किलोमीटर साइकिल यात्रा करनी पड़ी।

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अपनी Biography में आज की पोस्ट जीवन के सफर में जानकारी दूंगा, कि किस तरह मुझे अपने सच्चे मित्र की मोहब्बत की खातिर फेरीवाला का रूप धारण करके लगभग 150 किलोमीटर की यात्रा साइकिल से करनी पड़ी। उक्त जिंदगी के सफर में पहाड़ों की यात्रा भी शामिल थी। दोस्तों,           जैसा कि मैं अपनी पूर्व की कई पोस्ट में अपने बारे में विस्तार से बता चुका हूं, कि किस तरह मुझे कम उम्र में ही अपने घर से  लगभग 250 किलोमीटर दूर यमुनानगर में  जाकर अकेले ही दुकान करनी पड़ी थी। उस वक्त मेरी उम्र लगभग 15 वर्ष थी। जिंदगी के तमाम झंझावात को झेलते हुए मेरी जिंदगी शैने शैने आगे बढ़ रही थी। इस दौरान मेरे कुछ हम उम्र दोस्त भी बन गए थे। एक दोस्त उस दौरान आईटीआई में मैकेनिकल ड्राफ्ट्समैन का डिप्लोमा कर चुका था तथा उस समय वह करनाल के पास इंद्री नामक जगह पर स्थित पॉलिटेक्निक में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। वह मेरा बहुत ही घनिष्ट मित्र था। हमें एक दूसरे की सभी बातें पता होती थी तथा हम अपने सुख-दुख आपस में बांटते थे ।  वह वहां इंद्री में पॉलिटेक्निक में हॉस्टल / छात्रावास में...

श्मशान घाट से पैसे उठाकर दोस्तों को चने खिलाए बचपन में।

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जैसा कि मैं पूर्व में बता चुका हूं कि मेरा जन्म और परवरिश एक निहायत ही पिछड़े हुए गांव में हुआ था, जोकि जंगल के किनारे पर स्थित था। हमारे गांव से मुख्य सड़क लगभग ढाई किलोमीटर दूर थी, इसका वर्णन मैं अपनी बायोग्राफी | Biography में लिखी एक पोस्ट जिसका हेडिंग था, जिनका मिलना नहीं होता मुकद्दर में उनसे मोहब्बत कसम से कमाल की होती है, में विस्तार से दे चुका हूं।  दोस्तों,           यह बात उस वक्त की है जब मैं कक्षा 6 का छात्र था और मेरी उम्र लगभग 10 वर्ष के आसपास थी। हमारे गांव में प्राथमिक विद्यालय था, जहां पर कक्षा 5 तक की पढ़ाई होती थी। उसके बाद गांव से लगभग 3 किलोमीटर दूर दूसरे गांव में जूनियर हाई स्कूल था। हमें प्रतिदिन 3 किलोमीटर पैदल ही चल कर स्कूल में पढ़ने के लिए जाना पड़ता था।  उस दौर में कोई थ्री व्हीलर, बस, वेन, तांगा आदि हमारे गांव में नहीं आता था। जब हम अपने स्कूल जाते थे तो घर से 3 किलोमीटर दूर स्कूल तक हमें दूर-दूर तक कोई भी प्राणी नजर नहीं आता था। निहायत ही सुनसान रास्ता था, लेकिन बच्चों के दिल दिमाग में डर नामक चीज नहीं होते थे, केवल एक अप...